पनघट तक पीछे आके,
मेरी मटकी तोडके आँखे मिलाते,
नैनों में नयना डाल
मुस्कुरात ,
संखिओं को देख क्यूँ छुप
जाते?
आज समझ में आया,
थक जाती थी मैं किनारे तक
चल जब,
मेरे आँचल से अपना पसीना हटाते
थे
कच्ची मोड़ मेरे आँगन में
वोही से क्यूँ जाते,
आज समझ में आया
अकेली आना कहते,
सखियों को साथ ना लाना
मेरी कलाई थाम के घंटो क्या
ढूंढा करते
आज समझ में आया
जब भी शाम को लालटेन जलाऊ
छत से क्यूँ झाँका करते
जब तक ना ओझल हो जाये
क्यूँ पगडंडी तक देखा करते?
आज समझ में आया
जाड़े की नरम धूप में तुम
छत की आड़ में क्यों ले जाया करते
आँगन की वो छाव का बिस्तर,
और सपनो का तकिया,
रस्सीवाली वो प्यार में बुनी हुई वो खटिया,
मेरे पैरो को अपने पैरो से दबाना,
मेरी पायल का शरमाना,
घूँघरू का “छनछन” मुझे चिढाना,
मेरे आँचल को तेरा सर पे ओढांना,
देखना मुझे उस चोर निगाहों से,
फिर लजाके मेरा तुमसे सिमट जाना,
अंगीठी की वो नरम आंच,
बचपन का वो झूला
और जवानी की आँख मिचोली,
संखियो की खुसफुस सुनकर,
भागना अपनी मडईया ओर
बिन मतलब टीका सिंगार
बरसात का वो भीगा योवन
क्यूँ रखती थी मैं एक छोटा दर्पण
शायद आज समझ में आया,
जब तेरी यादों ने मुझे भिगाया
अब तो पियाजी पास नहीं,
तो बादल में बरसात नहीं,
पहले तो खेतो के आड़ में छुपकर,
तुम मुझे सताया करते,
पहनाऊंगा आज चुडिया कहकर
बहाने से बुलाया करते
“अम्मा” जी आई ऐसा कहकर
मुझे डराया करते,
फिर घंटो बतियाते , बालो को सहलाते,
कब तक देखू कहकर सीने से लगाया करते,
उड़ते पंछियों को देखकर
उन्हें चिढाया करते , हाय अब..
कोयल बहुत कम गुनगुनाती हैं
पियाजी याद बहुत ही आती हैं
पहले मेरी मेहँदी के सूखे,
तक भी नही रुक पाते थे,
उसपे अपना नाम ढुढते
दोपहर तक मुझे बताते
छेड़ते कभी तो कभी कमर को छुके
बहकाते थे
अब तो मेहंदी भी छूट गयी,
स्वप्न की गगरी फूंट गयी
बस बादल में धुंधला चेहरा हैं
जो साफ़ नज़र भी नहीं आता
तू जहा गया हैं मुझको भी
क्यों साथ नहीं लेकर जाता
क्या अलग थलग हैं जहां वहां
का?
वहां की याद बिछड़ी हैं
ना चरखा हैं बाबु जी का वहा ?
क्या माँ के हांथो की खिचड़ी
हैं
वहा तेरे नाम से गोरी कोई
काजल बिदिया सजाती हैं
मैं ही करती हु याद तुझे
या याद तुझे भी आती हैं
मुझको दीखता हैं तू ही तू
हर पल हर क्षण हर सू
पर सुना हैं जिस गाम गया तू हैं
बस काला-सियाह अँधेरा हैं
क्या देख सकेगा वहां मुझे तू?
सुना हैं दूर बहुत हैं जगह यहाँ से
क्या माँ की लोरियाँ वहां जाती हैं?
जो हवा छूती हैं मुझे क्या,
तुझे भी छूकर जाती हैं
तू खुद नहीं गया हैं वहा,
तुझे रब ने बुलाया हैं
इस वियोग का सारा किस्सा
आज समझ में आया !
अर्चना शर्मा




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