Thursday, October 24, 2013

लोग हँसते हैं !

मुझपे हस्ते हैं वो फूल जो तुमने मेरे बालो में लगाया था ,
हसते हैं ये रास्ते जिनपर साथ चला करते थे तुम ,
हंसता हैं वो बादल जिसकी धुप को तुम हथेली से छाव किया करते थे ,
देखो बारिश की वो बुँदे हंसती हैं जिस'से बचाने को तुम अक्सर मुझसे लिपट जाया करते थे,
अब सर्दिया हो चली तुम्हारे दिए गर्म कपडे भी मजाक उड़ायेंगे ,
बस्ती के वो राहगीर जिन्हें देख तुम हाथ थामा करते थे मुझे चिढाएंगे,
तुम्हारे दिए तोहफे ताना कसने से बाज़ नहीं आते ,
कितनी दूँ आवाज़ तुम मेरे पास नहीं आते ,
अब तो मेरी साँसों ने भी मुझसे बग़ावत की हैं ,
दिल ने मेरे मुझसे, धडकनों के बंद होने की शिकायत की हैं ,
क्या ये शिकायत साँसों के साथ ठहर जायेंगी ,
या किसी दिन तेरे लौट आने की खबर आएगी ?
कहो इस कमबख्त ज़माने को खामोश हो ,
या मुझे खामोश होने की इजाज़त दे ,
नही मिला सकता मेरे महबूब से
तो मुझे रिहाई दे , क़यामत दे, मुझे क़यामत दे ,
मेरे अल्लाह मुझे क़यामत दे ....

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